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महाशिवरात्रि: शिव भक्ति का पावन पर्व


महाशिवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन शिव भक्त व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग का अभिषेक कर भगवान शिव की आराधना करते हैं।


 हिंदू धर्म में सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है। इस दिन सभी शिव मंदिरों में भीड़-भाड़ का माहौल रहता है। महाशिवरात्रि के दिन सभी भक्त महादेव की कृपा पाने के लिए विधिवत पूजा-पाठ करते हैं। पंचांग के अनुसार शिवरात्रि फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। महाशिवरात्रि भगवान शिव का त्यौहार है। भारत के सभी प्रदेशो में महाशिव रात्रि का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। भारत के साथ नेपाल, मारिशस सहित दुनिया के कई अन्य देशों में भी महाशिवरात्रि मनाते है। हर साल फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिव रात्रि का व्रत किया जाता है। हिन्दू पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के आरंभ में मध्यरात्रि मे भगवान शिव ब्रह्मा से रुद्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि कहा जाता है।

योगिक परम्परा में इस दिन और रात को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है क्योंकि यह आध्यात्मिक साधक के लिए जबर्दस्त संभावनाएं प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक विज्ञान कई चरणों से गुजरने के बाद आज उस बिंदु पर पहुंच गया है। जहां वह प्रमाणित करता है कि हर वह चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं। पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं। जिसे आप ब्रह्मांड और आकाशगंगाओं के रूप में जानते हैं। वह सिर्फ एक ही ऊर्जा है। जो लाखों रूपों में खुद को अभिव्यक्त करती है।

माना जाता है की इस दिन भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव की पूजा करते है। महाशिवरात्रि का व्रत रखना सबसे आसान माना जाता है। इसलिये बच्चों से लेकर बूढ़ो तक सभी इस दिन व्रत रखते हैं। महाशिवरात्रि के व्रत रखने वालों के लिये अन्न खाना मना होता है। इसलिये उस दिन फलाहार किया जाता है। राजस्थान में व्रत के समय गाजर, बेर का सीजन होने से गांवों में लोगों द्धारा गाजर, बेर का फलाहार किया जाता है। लोग मन्दिरों में भगवान शिव की पूजा करते हैं व उन्हे आक, धतूरा चढ़ाते हैं। भगवान शिव को विशेष रूप से भांग का प्रसाद लगता है। इस कारण इस दिन काफी जगह शिवभक्त भांग घोट कर पीते हैं।

पुराणों में कहा जाता है कि एक समय शिव पार्वती जी कैलाश पर्वत पर बैठे थी। उसी समय पार्वती ने प्रश्न किया कि इस तरह का कोई व्रत है जिसके करने से मनुष्य आपके धाम को प्राप्त कर सके ? तब उन्होंने यह कथा सुनाई थी कि प्रत्यना नामक देश में एक व्यक्ति रहता था, जो जीवों को बेचकर अपना भरण पोषण करता था। उसने सेठ से धन उधार ले रखा था। समय पर कर्ज न चुकाने के कारण सेठ ने उसको शिवमठ में बन्द कर दिया।

संयोग से उस दिन फाल्गुन बदी चतुर्दशी थी। वहां रातभर कथा, पूजा होती रही जिसे उसने भी सुना। अगले दिन शिघ्र कर्ज चुकाने की शर्त पर उसे छोड़ा गया। उसने सोचा रात को नदी के किनारे बैठना चाहिये। वहां जरूर कोई न कोई जानवर पानी पीने आयेगा। अतः उसने पास के बील वृक्ष पर बैठने का स्थान बना लिया। उस बील के नीचे एक शिवलिंग था। जब वह पेड़ पर अपने छिपने का स्थान बना रहा था उस समय बील के पत्तों को तोडकर फेंकता जाता था जो शिवलिंग पर ही गिरते थे। वह दो दिन का भूखा था। इस तरह से वह अनजाने में ही शिवरात्रि का व्रत कर ही चुका था। साथ ही शिवलिंग पर बेल-पत्र भी अपने आप चढ़ते गये।

एक पहर रात्रि बीतने पर एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई। उस व्याध ने तीर को धनुष पर चढ़ाया किन्तु हिरणी की कातर वाणी सुनकर उसे इस शर्त पर जाने दिया कि सुबह होने पर वह स्वयं आयेगी। दूसरे पहर में दूसरी हिरणी आई। उसे भी छोड़ दिया। तीसरे पहर भी एक हिरणी आई उसे भी उसने छोड़ दिया और सभी ने यही कहा कि सुबह होने पर मैं आपके पास आऊंगी। चौथे पहर एक हिरण आया। उसने अपनी सारी कथा कह सुनाई कि वे तीनों हिरणियां मेरी स्त्री थी। वे सभी मुझसे मिलने को छटपटा रही थी। इस पर उसको भी छोड़ दिया तथा कुछ और भी बेल-पत्र नीचे गिराये। इससे उसका हृदय बिल्कुल पवित्र, निर्मल तथा कोमल हो गया।

प्रातः होने पर वह बेल-पत्र से नीचे उतरा। नीचे उतरने से और भी बेल पत्र शिवलिंग पर चढ़ गये। अतः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसके हृदय को इतना कोमल बना दिया कि अपने पुराने पापों को याद करके वह पछताने लगा और जानवरों का वध करने से उसे घृणा हो गई। सुबह वे सभी हिरणियां और हिरण आये। उनके सत्य वचन पालन करने को देखकर उसका हृदय दुग्ध सा धवल हो गया और वह फूट-फूट कर रोने लगा।

शिवरात्रि के प्रसंग को हमारे वेद, पुराणों में बताया गया है कि जब समुद्र मन्थन हो रहा था उस समय समुद्र में चौदह रत्न प्राप्त हुए। उन रत्नों में हलाहल भी था। जिसकी गर्मी से सभी देव दानव त्रस्त होने लगे। तब भगवान शिव ने उसका पान किया। उन्होंने लोक कल्याण की भावना से अपने को उत्सर्ग कर दिया। इसलिए उनको महादेव कहा जाता है। जब हलाहल को उन्होंने अपने कंठ के पास रख लिया तो उसकी गर्मी से कंठ नीला हो गया। तभी से भगवान शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। शिव का अर्थ कल्याण होता है। जब संसार में पापियों की संख्या बढ़ जाती है तो शिव उनका संहार कर लोगों की रक्षा करते हैं। इसीलिए उन्हें शिव कहा जाता है।

योगियों और संन्यासियों के लिए यह वह दिन है जब शिव कैलाश पर्वत के साथ एकाकार हो गए थे। योगिक परम्परा में शिव को ईश्वर के रूप में नहीं पूजा जाता है। बल्कि उन्हें प्रथम गुरु, आदि गुरु माना जाता है। जो योग विज्ञान के जन्मदाता थे। कई सदियों तक ध्यान करने के बाद शिव एक दिन वह पूरी तरह स्थिर हो गए। उनके भीतर की सारी हलचल रुक गई और वह पूरी तरह स्थिर हो गए। वह दिन महाशिवरात्रि था। इसलिए संन्यासी महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात के रूप में देखते हैं।

महाशिवरात्रि का पर्व हमारे जीवन में ईश्वरीय शक्ति के महत्व को दिखलाता है। हमें भगवान शिव के द्वारा मानव जाति तथा सृष्टि के कल्याण के लिए विषपान जैसे असीम त्याग को प्रदर्शित करता है। यह दिन हमें इस बात की याद दिलाता है कि यदि हम अच्छे कर्म करेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखेंगे तो ईश्वर भी हमारी रक्षा अवश्य केरेंगे। लोगों का मानना है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव हमारे निकट होते हैं और इस दिन पूजा अर्चना तथा रात्रि जागरण करने वालों को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। कई लोग इस दिन दान धर्म करते है तथा गरीबों को खाना खिलाकर भगवान शिवजी से अपनी सुखी जीवन के लिए प्राथना करते है।

महाशिवरात्रि आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। इस रात धरती के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है कि इंसान के शरीर में ऊर्जा कुदरती रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इस दिन प्रकृति इंसान को अपने आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है। गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोग महाशिवरात्रि को शिव की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाएं रखने वाले लोग इस दिन को शिव की दुश्मनों पर विजय के रूप में देखते हैं।

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है।

शिवरात्रि व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को अर्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए।

चतुर्दशी के स्वामी शिव हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिपदा आदि सोलह तिथियों के अग्नि आदि देवता स्वामी होते हैं। अतः जिस तिथि का जो देवता स्वामी होता है उसे देवता का उसे तिथि में व्रत पूजन करने से उसे देवता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं अथवा शिवजी की तिथि चतुर्दशी है रात्रि में व्रत करने से इसको शिवरात्रि कहते हैं।

व्रत का महत्व

शिव पुराण की कोटरूद्र संहिता मे बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

शिव को रात्रि ही क्यों प्रिय

अन्य देवताओं का पूजन व्रत आदि जबकि प्रायः दिन में ही होता है तब भगवान शंकर को रात्रि ही क्यों प्रिय हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि ही क्यों? भगवान शंकर संहारशक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं।अतः तमोमयी रात्रि से उनका स्नेहा लगा वी होना स्वाभाविक ही है रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है।

फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी का रहस्य

जहां तक प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के शिवरात्रि के लाने की बात है वे सभी शिवरात्रि ही कहलाती हैं और फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष में पडने वाली चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।


उपवास रात्रि जागरण क्यों

धर्म ग्रंथो के अनुसार उपवास विषय निवृत्ति का अचूक साधन है। अतः आध्यात्मिक साधना के लिए उपवास करना परम आवश्यक है। गीता के अनुसार उपवास इंद्रियों और मन पर नियंत्रित करने वाला संयमी व्यक्ति ही रात्रि में जागरण कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो सकता है।

वैसे तो शिव मंदिर आपको काफी दिखाई देंगे। परंतु मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर की अपनी महिमा है। आइए जानते इनके विषय मेंं



मुंबई का प्रसिद्ध बाबुलनाथ मंदिर: आस्था और इतिहास का प्रतीक

मुंबई: महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में स्थित बाबुलनाथ मंदिर (Babulnath Temple) भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर अपनी भव्यता और धार्मिक महत्व के कारण देश-विदेश के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। खासकर महाशिवरात्रि और प्रत्येक सोमवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बाबुलनाथ मंदिर गिरगांव चौपाटी के पास मालाबार हिल्स की पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर का नाम एक ग्वाले 'बाबुल' के नाम पर रखा गया, जिसने इस स्थान पर स्थित शिवलिंग को अपने गुरु श्री पांडुरंग को दिखाया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह शिवलिंग बबूल के पेड़ की छाया में पाया गया था, जिसके कारण इसका नाम बाबुलनाथ पड़ा।

वास्तुकला और धार्मिक महत्व

मराठी शैली में निर्मित यह मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला के लिए जाना जाता है। 1780 में निर्मित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मंदिर परिसर से भक्तों को मुंबई का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है।

मीठी नदी से संबंध

मंदिर के पास बहने वाली 17.84 किलोमीटर लंबी मीठी नदी भी इसके महत्व को बढ़ाती है। यह नदी मुंबई की प्रमुख नदियों में से एक है और शहर की जल आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

श्रद्धालुओं की आस्था

बाबुलनाथ मंदिर में प्रत्येक सोमवार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। वहीं, महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है, जो भोलेनाथ के दर्शन के लिए दूर-दूर से यहां आते हैं।

बाबुलनाथ मंदिर अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के कारण न केवल मुंबई, बल्कि पूरे भारत में शिवभक्तों के लिए एक प्रमुख आस्था स्थल बना हुआ है।


साभार-सोशल मीडिया

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