रवीन्द्र मिश्रा | मुंबई
तुंगारेश्वर स्थित परशुराम कालीन शिव मंदिर में 20 फरवरी, गुरुवार को जागमाता महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। मंदिर के प्रबंधक दत्ता हिंगा के अनुसार, आदिवासी समुदाय जागमाता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई देवी की पूजा अवश्य ही फलदायी होती है।
आदिवासी समुदाय की आस्था
आदिवासी परंपरा के अनुसार, विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े जागमाता के दर्शन कर अपने सुखद भविष्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह मंदिर तुंगारेश्वर शिव मंदिर के उत्तरी छोर की पहाड़ी पर स्थित है, जिसे शिवभक्त मां पार्वती का रूप मानते हैं।
गंगा जल का पवित्र स्रोत
मंदिर के ठीक पीछे से मां गंगा की अविरल धारा प्रवाहित होती है, जिसे गोमुख से निकलता पवित्र जल माना जाता है। भक्त इस जल में स्नान करने और इसका सेवन करने से रोगों से मुक्ति पाने की मान्यता रखते हैं।
मंदिर का पुनर्निर्माण और इतिहास
शिव मंदिर के प्रबंधक दत्ता हिंगा ने बताया कि पुरातन मंदिर समय के साथ जीर्ण-शीर्ण हो गया था। इसे देखकर परशुराम कुण्ड पर तपस्या करने वाले बालयोगी सदानंद महाराज भावुक हो उठे और अपने प्रयासों से इसका जीर्णोद्धार कराया। आज यह मंदिर एक दिव्य देवी स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, जहां भक्त छोटी-छोटी सीढ़ियां चढ़कर आसानी से माता के दर्शन कर सकते हैं।
महोत्सव के विशेष कार्यक्रम
20 फरवरी को जागमाता महोत्सव के अवसर पर विविध धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। यह मंदिर दिनभर दर्शन के लिए खुला रहेगा और रात की आरती के बाद बंद किया जाएगा।
जागमाता का चमत्कारी इतिहास
मंदिर में वर्षों से तपस्यारत शेट्टी बाबा के अनुसार, प्राचीन समय में माता का वाहन बाघ मंदिर में आता था और देवी की परिक्रमा कर वापस चला जाता था। वे स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें इस दिव्य दृश्य के दर्शन का अवसर मिला।
इस महोत्सव में महिम निवासी पाटिल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां माता के दर्शन के लिए उमड़ने की संभावना है।
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